शहडोल - जिला चिकित्सालय का क्षय रोग (टीबी) विभाग गंभीर प्रशासनिक अव्यवस्था और उदासीनता का सामना कर रहा है। विभाग में मरीजों की जांच के लिए स्थापित लगभग 20 से 30 लाख रुपये मूल्य की आधुनिक डिजिटल एक्स-रे मशीन पिछले तीन वर्षों से संचालन की प्रतीक्षा में धूल फांक रही है। इस लापरवाही की कलई तब खुल गई जब विभागीय अधिकारी ने स्वयं इस तथ्य को स्वीकार किया।
जर्जर भवन में गिरी छत, मशीन की सुरक्षा खतरे में -
विभाग के 1963 में निर्मित पुराने भवन की स्थिति अत्यंत दयनीय है। बीती रात एक्स-रे कक्ष की छत को सहारा देने वाला एक लकड़ी का गर्डर दीमक लगने के कारण सड़कर टूट गया। गनीमत रही कि यह हादसा रात में हुआ, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई। इसी जर्जर कमरे में लाखों की संवेदनशील डिजिटल एक्स-रे मशीन रखी हुई है, जो लगातार सीलन और असुरक्षित माहौल के कारण खराब होने की कगार पर है। सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से बंद रहने के कारण मशीन का सेंसर भी खराब हो सकता है।
अधिकारी ने स्वीकारी विफलता, तीन साल से घूम रही फाइलें -
मामला सामने आने के बाद, विभागीय अधिकारी वाय. के. पासवान ने अंततः स्वीकार किया कि एक्स-रे मशीन इंस्टॉल होने के बावजूद शुरू नहीं की जा सकी है। उन्होंने इसका कारण 'एआरबी' (ARB) की अनुपलब्धता बताया और कहा कि संचालन के प्रयास जारी हैं। हालांकि, यह वही स्पष्टीकरण है जो पिछले तीन वर्षों से दिया जा रहा है।
मरीजों पर दोहरी मार, 'टीबी मुक्त भारत' अभियान पर प्रश्नचिन्ह -
इस लापरवाही का सीधा खामियाजा टीबी के गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। टीबी के निदान और निगरानी में एक्स-रे जांच अनिवार्य है, लेकिन विभाग में सुविधा न होने के कारण मरीजों को या तो जिला अस्पताल के अन्य वार्डों में या फिर निजी जांच केंद्रों की ओर रुख करना पड़ रहा है, जहाँ उन्हें अतिरिक्त आर्थिक भार उठाना पड़ता है।
यह स्थिति सरकार के महत्वाकांक्षी 'टीबी मुक्त भारत' अभियान की जमीनी हकीकत पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
तकनीशियन की नियुक्ति, फिर भी संचालन शून्य -
आश्चर्यजनक रूप से, मशीन के संचालन के लिए एक तकनीशियन मनीष श्रीवास्तव की नियुक्ति भी की गई थी। लेकिन, मशीन शुरू करने के बजाय, उक्त तकनीशियन को पिछले एक साल से जिला अस्पताल के दूसरे वार्ड में एक्स-रे रूम में पदस्थ कर दिया गया है। यह सवाल उठता है कि जब मशीन और तकनीशियन दोनों उपलब्ध थे, तो इसे जानबूझकर क्यों बंद रखा गया।
क्या 'स्क्रैप' दिखाकर नई खरीद की है तैयारी?
विभागीय गलियारों में ऐसी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि मशीन को जानबूझकर खराब होने दिया जा रहा है, ताकि इसे अनुपयोगी या 'स्क्रैप' घोषित कर नई मशीन की खरीद का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। यदि यह सच है, तो यह मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और संभावित भ्रष्टाचार का भी संकेत देता है।
बात दे कि यह ख़बर कई अखबारों में चार दिनों से चल रही है इसी बीच टीबी विभाग के पूरे जर्जर भवन में छत सिर्फ बंद टीबी रूम की ही गिरी जबकि टीबी विभाग के अन्य कमरे पूरी तरह सुरक्षित है और खून जांच दवाई वितरण भी इसी भवन में होता है और यह कमरे पूरी तरह सुरक्षित रहे यह भी जाँच का विषय है कि अखबारों में खबर लगते ही टीबी रूम की ही छत गिरी जबकि तीन वर्षों से सही सलामत थी। टीबी विभाग का एक्स- रे कक्ष कही किसी की साजिश का तो शिकार नहीं हो रहा या किसी के द्वारा एक्स- रे कक्ष जान बूझकर संचालन नहीं करना चाहता। यह भी जाँच का विषय है?
अब देखना यह है कि तीन साल की प्रशासनिक चुप्पी, जर्जर भवन, और मरीजों की परेशानी के बाद, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जिला कलेक्टर, कमिश्नर और वरिष्ठ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस मामले की जवाबदेही तय करते हैं और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करते हैं।


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