शहडोल - शिवम कॉलोनी निवासी श्री सी.एल. मिश्रा जी के निवास शारदा सदन में विश्व मानवाधिकार दिवस के शुभ अवसर पर स्थानीय साहित्यकारों की काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया । कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मृगेन्द्र श्रीवास्तव ने बताया कि गोष्ठी में शामिल होकर कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानव जाति एवं विश्व कल्याण का संदेश प्रस्तुत किया ।
कार्यक्रम की शुरुआत वाणी वंदना के साथ हुई ।मुख्य अतिथि पंडित शंभू नाथ शुक्ल विश्वविद्यालय की भाषा विभाग की संकायाध्यक्ष श्रीमती नील मणि दुबे ,अध्यक्ष सेवानिवृत शिक्षक एवं साहित्यकार श्री रामाधार श्रीवास्तव एवं श्री कृष्ण कुमार मिश्रा रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन गीतकार मृगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने किया। आयोजन में नगर के प्रतिष्ठित रचनाकार श्री रजिन्दर सिंह राज ,रजनीश सोनी ,सुनील नाथ तिवारी, बृजमोहन सर्राफ बसर,मिथिलेश राय, श्रीमती संगीता शुक्ला, जनार्दन पांडेय ,अभिषेक श्रीवास्तव विशेष रूप से उपस्थित रहे एवं अपनी रचनाओं के पाठ से गोष्ठी को ऊंचाइयाँ प्रदान की।
रचनाकारों की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही रास्ता खुद हमें बनाना है। हमने मन में आज यह ठाना है ।। अभिषेक श्रीवास्तव शिवा हिंसक जानवरों की हिंसात्मक प्रवृत्ति ही नहीं बल्कि अपनी सरलता व सीधेपन के कारण ही मारी जाती रही अब तक। मिथिलेश राय
क्यों बचाने में लगा है सबका सब ।
रेत की दीवार सा है सब का सब ।।
रजिन्दर सिंह राज
इस दागी दुनिया का वेदाग परिंदा हूं ।
प्यासा हूं सदियों से फिर भी जिंदा हूं ।।
जनार्दन पांडे
देख कुकृत्य भयावह ऐसा अन्याय से विचलित हूं मैं ।
हर युग में नारी पर हुए अत्याचार की विरोधी हूं मैं।।
संगीता शुक्ला
स्वरा कुछ संदर्भ बहुत जहरीले। लगा तख्तियां ठोकी कीलें। चेहरे हुए लाल फिर पीले। चिड़ियों पर भी झपटी चीलें।
प्यासे रहे बहुत थी झीलें।
दिशाहीन कर दिया सरफिरी पागल हुई हवाओं ने ।।
सुनील तिवारी
यह शरीर स्यंदन जिसमें बल बुद्धि दो अश्व जुते हैं ।
संयम की अदृश्य रज्जुओं से ये बंधे हुए हैं ।।
रजनीश सोनी
कहां ढूंढते हो मुझे तुम बता दो ।
मैं सर्वदा सब जगह रहा हूं।।
कृष्ण कुमार मिश्रा
जिंदगी भर दोहराई यह कथा जाती रही ।
क्या कहें जितना कहा उतनी रही यह अनकही ।
उस परिंदे ने जहां अरमान का तिनका रखा ,
डाल अक्सर आँधियों से टूट जाती है वही।।
डॉक्टर नीलमणि दुबे
दिल खुदा से कभी नहीं डरता ।
सिर्फ बंदों से खौफ खाता है।।
बृजमोहन सराफ बसर
एक नई शाला खुले जो पाठ नेकी का पढ़ाये।
प्यार का ,सहयोग का ,श्रम का सबक ,सबको सिखाए। होः गुरु ऐसे जो इंसा की तरह जीना सिखाए ।
शून्य होती जा रहीं संवेदनाएं ।।
मृगेन्द्र श्रीवास्तव
ऊपर से बैठ देखता परवरदिगार है ।
वह जानता तू कितना बड़ा होशियार है ।
रखो न सर पे पाप की गठरी को लादकर ।
सौगात यार मिलती नहीं बार-बार है ।।
सी एल मिश्रा साहिल
प्राणों से प्रिय तस्वीर तेरी, इस दिल में उतारा करते हैं। एक तुम ही हो जिसके दम पर ,
हम खुद को निखारा करते हैं ।।
रामाधार श्रीवास्तव
काव्य गोष्ठी के अंत में समस्त रचनाकारों की रचनाओं पर परस्पर समीक्षा की गई एवं भविष्य में नियमित रूप से ऐसे आयोजन किए जाने पर जोर दिया गया ।कार्यक्रम आयोजक श्री सी एल मिश्रा साहिल द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।

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