शहडोल - जिले में शराब के नए ठेके शुरू होते ही उपभोक्ताओं की जेब पर डाका डालने का खेल शुरू हो गया है। शहर की देशी और विदेशी शराब दुकानों पर खुलेआम MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) से अधिक वसूली की जा रही है। ताज्जुब की बात यह है कि इस अवैध वसूली को रोकने वाला आबकारी विभाग न केवल मौन है, बल्कि विभाग के अधिकारियों पर ठेकेदारों से सांठगांठ के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल: ₹200 में 'बिक' रहे अधिकारी?
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। वीडियो पुरानी बस्ती फाटक स्थित स्टेशन रोड की शराब दुकान का बताया जा रहा है।
वीडियो का मुख्य अंश: वीडियो में एक युवक आबकारी अधिकारी के सामने ₹200 की शराब ₹220 में बेचे जाने की शिकायत कर रहा है।
विवादास्पद बयान: शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय, अधिकारी कैमरे के सामने शराब दुकान से ₹200 लेते हुए नजर आ रहे हैं। जब युवक ने इस पर सवाल उठाया, तो अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना जवाब आया कि "यह तो चाय-पानी के लिए लिया है।"
भ्रष्टाचार का नया केंद्र: हाउसिंग बोर्ड का 'प्राइवेट सेफ हाउस'
सूत्रों के अनुसार, इस अवैध वसूली और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए हाउसिंग बोर्ड स्थित एक निजी आवास को मुख्य केंद्र बनाया गया है। चर्चा है कि यहाँ से एक रसूखदार शराब ठेकेदार और शहर के एक नामी रेस्टोरेंट संचालक की मिलीभगत से 'लिफाफा सिस्टम' का संचालन किया जा रहा है। इसी स्थान से विभागीय अधिकारियों के साथ सांठगांठ की पूरी पटकथा लिखी जाती है।
नियमों की धज्जियां: कमिश्नर निवास मार्ग पर अवैध विज्ञापन
शराब ठेकेदारों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने यातायात नियमों और प्रशासनिक गरिमा को भी ताक पर रख दिया है।
1. अवैध होर्डिंग्स: शहर के मुख्य मार्ग, जो सीधे कमिश्नर निवास की ओर जाता है, उसके बीचों-बीच ठेकेदारों ने शराब के विज्ञापन बोर्ड लगा दिए हैं।
2. प्रशासन का दोहरा रवैया: स्थानीय लोगों का कहना है कि यातायात पुलिस छोटे दुकानदारों के बोर्ड तो अतिक्रमण के नाम पर उठा ले जाती है, लेकिन रसूखदारों द्वारा सड़क के बीच जमाए गए इन बोर्डों पर उनकी नजर नहीं पड़ रही है।
ग्राहकों को धमकी: "नीलामी महंगी हुई है, वसूली तो होगी"
जब कोई जागरूक ग्राहक MRP से अधिक पैसे लेने का विरोध करता है, तो सेल्समैन द्वारा यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि "ठेका ऊँची बोली में मिला है, तो वसूली ऐसे ही होगी।" यह सीधे तौर पर जिला प्रशासन और आबकारी नियमों को चुनौती देने जैसा है।
बड़ा सवाल: क्या जिला प्रशासन और आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस संगठित लूट से अनजान हैं? या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब आम जनता को इन 'बेलगाम' ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया गया है?

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